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( contest ) 1- हिंदी पर गर्व

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विषय – ‘हिन्दी बाजार की भाषा है, गर्व की नहीं’ या ‘हिंदी गरीबों, अनपढ़ों की भाषा बनकर रह गई है’ – क्या कहना है आपका?

हिंदी पर गर्व

हिंदी गर बाजार की भाषा है ,
गरीबों,अनपढ़ों की भाषा है |

कौन सा देश बिना बाजार का ?
कौन सा देश सिर्फ रईसों का ?

छोटे – बड़े मिल सभी आकारों में ,
ढलती सभ्यता सभी विचारों से |

करोड़पति तो मुट्ठी भर होते हैं ,
फिर अंग्रेजी भी कम ही कहते हैं |

देश को मध्यम वर्ग है चलाता ,
हाट – बाजार पर जीवन पलता |

सत्य-हिंदी ने कई आक्षेप सहे हैं ,
फिर भी इसे नहीं डिगा सके हैं |

कई भाषाओं को समेट चलती है ,
स्वच्छंद जीवन संग ये पलती है |

थोड़ी धुंधली शायद ही दिखती है ,
पर कहीं भी उन्नीस नहीं पड़ती है |

भ्रम में डूबे लोगों के लिए निराशा है ,
फिर भी इससे ही हमको आशा है |

यहाँ लेखक,कवि जब तक जिंदा हैं ,
हिंदी पाठक भी लेखनी पर फ़िदा हैं |

कभी भी बाल न बांका इसका होगा ,
भले ही खड़ा हो अंग्रेजी का दरोगा |

आखिर तो सांच को आंच नहीं है ,
कोई इस हिंदी सी सौगात नहीं है |

यह मातृभाषा तो बहुत ही प्यारी है ,
हृदय को छूती यह सबसे न्यारी है |

यह भाषा तो समृद्ध,स्वयं समर्थ है ,
हिन्दुस्तान प्रश्न तो हिंदी अर्थ है |

हम हिन्दुस्तान में पैदा हुए हैं ,यहाँ का हर नागरिक स्वयं पर गर्व करता है ,उसे हिन्दुस्तानी होने पर गर्व है , उसे अपनी जमीन से अपने देश से लगाव है ,और जब हमें अपने भारतीय नागरिक होने पर गर्व है तो अपनी मातृ भाषा हिंदी से कैसे विमुख हो सकते है ? देश हमारा ह्रदय है तो हिंदी हमारी धड़कन | हमारे देश की मुख्य पहचान यहाँ के हाट ,बाजार ,यहाँ की खूबसूरती , यहाँ की सभ्यता और कृषि है | हमारे देश की मिटटी में हिंदी रची बसी है |
हमारे देश की धरती को हम धरती माँ कहते हैं और हिंदी को राष्ट्र भाषा मानती हूँ मैं | हिंदी तो माथे की बिंदी है जो देश के भाल पर शोभित बिंदी के सामान दमकती रहती है , फिर वह समर्थ , असमर्थ , गरीबों की बोली या अनपढ़ों की बोली इस विवाद से बिलकुल परे सर्वश्रेष्ठ है | इस धरती ने हिंदी में लिखने वाले कई लेखकों और कविओं को जन्म दिया है और पाठकों ने भी खुले दिल से हिंदी को पूर्ण सम्मान के साथ अपनाया है |
आज तक हिंदी कवि , लेखक अपना लोहा मनवाते रहे हैं और आने वाले समय में भी समृद्ध हिंदी भाषा के , हिंदी से समृद्ध लेखक आते ही रहेंगे और हिंदी तथा अपनी पहचान बनाते ही रहेंगे |हमें गर्व है अपने देश पर , अपनी धरती माँ पर और अपनी भाषा हिंदी पर |
जब तक हिन्दुस्तान है , हिन्दुस्तानी हैं तब तक हिंदी अजर अमर है ,यह कोई ऐसी भाषा नहीं है कि सभ्यताएं आईं और चली गईं साथ में भाषा भी मिट गई | हमारा देश और इसकी भाषा हमारी हिंदी स्वयं समृद्ध और अमर है —

यह भाषा तो समृद्ध,स्वयं समर्थ है ,
हिन्दुस्तान प्रश्न तो हिंदी अर्थ है ।

(जयश्री वर्मा )



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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

neena के द्वारा
September 21, 2013

सुन्दर एवम भाव पूर्ण अभिव्यक्ति .बधाई

    Jaishree Verma के द्वारा
    September 22, 2013

    प्रतिष्ठा में , नीना जी , रचना पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए आपका बहुत – बहुत धन्यवाद !

yogi sarswat के द्वारा
September 21, 2013

हमारे देश की धरती को हम धरती माँ कहते हैं और हिंदी को राष्ट्र भाषा मानती हूँ मैं | हिंदी तो माथे की बिंदी है जो देश के भाल पर शोभित बिंदी के सामान दमकती रहती है , फिर वह समर्थ , असमर्थ , गरीबों की बोली या अनपढ़ों की बोली इस विवाद से बिलकुल परे सर्वश्रेष्ठ है | इस धरती ने हिंदी में लिखने वाले कई लेखकों और कविओं को जन्म दिया है और पाठकों ने भी खुले दिल से हिंदी को पूर्ण सम्मान के साथ अपनाया है | आज तक हिंदी कवि , लेखक अपना लोहा मनवाते रहे हैं और आने वाले समय में भी समृद्ध हिंदी भाषा के , हिंदी से समृद्ध लेखक आते ही रहेंगे और हिंदी तथा अपनी पहचान बनाते ही रहेंगे |हमें गर्व है अपने देश पर , अपनी धरती माँ पर और अपनी भाषा हिंदी पर | हिंदी को समर्पित बहुत प्रभावी और तेज तर्रार लेख दिया है आपने आदरणीय जय श्री वर्मा जी ! हार्दिक शुभकामनायें !

    Jaishree Verma के द्वारा
    September 21, 2013

    प्रतिष्ठा में , योगी सारस्वत जी , मेरी रचना पर आपकी प्रतिक्रियाओं का सदा ही स्वागत है , आपका बहुत – बहुत धन्यवाद !

Pradeep Kesarwani के द्वारा
September 17, 2013

यह भाषा तो समृद्ध,स्वयं समर्थ है , हिन्दुस्तान प्रश्न तो हिंदी अर्थ है । इस खूबसूरत भाव सारे सवालो का हल हैं …. बेहतरीन अभिलेख बधाई

    Jaishree Verma के द्वारा
    September 18, 2013

    प्रतिष्ठा में , प्रदीप केसरवानी जी ! रचना पर आपके विचारों के लिए आपका बहुत – बहुत धन्यवाद !

bhanuprakashsharma के द्वारा
September 15, 2013

सुंदर अभिव्यक्ति। हिंदी आमजन की भाषा है। इस पर हमें गर्व है। साथ ही यह भी है कि हिंदी को किसी दिन विशेष की जरूरत नहीं है। यह तो सुबह से शाम तक हमारे जीवन का अंग है। इसके भविष्य को कोई खतरा नहीं है। 

    Jaishree Verma के द्वारा
    September 18, 2013

    प्रतिष्ठा में , भानु प्रकाश शर्मा जी ! रचना पर प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत – बहुत धन्यवाद !

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
September 13, 2013

हमारे देश की धरती को हम धरती माँ कहते हैं और हिंदी को राष्ट्र भाषा हिंदी , हिंदी तो माथे की बिंदी है जो देश के भाल पर शोभित बिंदी के सामान दमकती रहती है , फिर वह समर्थ , असमर्थ , गरीबों की बोली या अनपढ़ों की बोली इस विवाद से बिलकुल परे सर्वश्रेष्ठ है आदरणीया जयश्री जी बहुत सुन्दर शब्द आप के हिंदी के मान में आइये उत्तरोतर इसे ताज सा सजाये रखें और ये परचम लहराती बढती चले ..जय हिंदी जय हिन्द भ्रमर ५

    Jaishree Verma के द्वारा
    September 18, 2013

    प्रतिष्ठा में , सुरेन्द्र शुक्ला भ्रमर जी ! आभार आपका सुंदर प्रतिक्रिया के लिए !

September 11, 2013

आखिर तो सांच को आंच नहीं है , कोई इस हिंदी सी सौगात नहीं है | यह भाषा तो समृद्ध,स्वयं समर्थ है , हिन्दुस्तान प्रश्न तो हिंदी अर्थ है । बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति हिंदी के लिए जय श्री जी .

    Jaishree Verma के द्वारा
    September 12, 2013

    प्रतिष्ठा में , शालिनी कौशिक जी ! मेरे ब्लॉग पर आपके विचारों के लिए आपका धन्यवाद !


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